Monday, August 2, 2010

ओबामा का नया कीर्तिमान

बराक ओबामा ने राष्ट्रपति पद जीतकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इससे पूर्व उनका राष्ट्रपति का प्रत्याशी बनना ऐतिहासिक घटना थी। परन्तु अब भारी बहुमत से चुनाव जीतकर उन्होंने एक नहीं अनेक रेकॉर्ड (कीर्तिमान) स्थापित किये हैं। ओबामा प्रथम अफरीकन - अमेरिकन (काले) राष्ट्रपति हैं। ओबामा ने सर्वाधिक मत पाकर जीत हासिल की है। ओबामा को ३४९ (चुनावी मत) एवं मकैन को १६२ (चुनावी मत) मिले हैं। लोकप्रिय मत में भी ओबामा को ५२% एवं मकैन को ४६% मत मिले हैं। यूं तो आंकड़ो की लम्बी श्रंखला है परन्तु यदि हम इनका सूक्ष्म निरिक्षण करें तो खुद चौकानें वाले तथ्य सामने आते हैं। अमेरिका में वर्ष १९७४ में ९०% मतदाता श्वेत थे परन्तु २००८ में मात्र ७४% मतदाता श्वेत रह गये। इनकी जनसँख्या तेजी से घट रही है और अन्य रंग के लोग अधिक से अधिक अमेरिका में बस रहे हैं। इस चुनाव में ७४% श्वेत, १२% काले, ९% स्पनिश एवं ५% अन्य जैसे एशियाई मतदाता थे। महिलाओं ने ओबामा के पक्ष में अधिक मत डाले हैं। ४९% पुरुषों ने ओबामा को मत दिए तो ५६% महिलाओं ने ओबामा के पक्ष में मतदान किया। अन्य प्रमुख आंकड़ों के अनुसार ४३% श्वेत मतदाताओं ने ओबामा को अपना समर्थन दिया। परन्तु ९५% काले, ६७% स्पैनिश एवं ६२% एशियाई लोगों ने ओबामा के पक्ष में वोट डाले।

कुल मतदाताओं की सूची में से ६६% मत ओबामा के पक्ष में एवं ३१% मकैल को मिले। युवा मतदाताओं ने ओबामा को बढचढ कर अपना समर्थन दिया। १८ वर्ष से ३० वर्ष के ६६% मतदाताओं ने ओबामा के समर्थन में मतदान किया ५० हज़ार डॉलर से कम आय वाले ६०% मतदाताओं ने ओबामा को समर्थन दिया। दूसरी ओर धनी वर्ग में ४९% मत ओबामा को मिले। इस बार युवा मतदाताओं (जिन्होंने प्रथम बार मतदान किया) ने ६९% मत ओबामा के समर्थन में डाले। जबकि मकैन को मात्र ३०% मत ही मिले।

उपरोक्त आंकड़ों से कुछ बातें तो स्पष्ट हैं, अमेरिका में श्वेत प्रजाति की संख्या घट रही है। पहले काले लोग चुनाव में अधिक भाग नहीं लेते थे। उनके अनुसार कोई भी जीते, उनकी स्थिति तो निराशाजनक ही रहनी है। परन्तु इस बार गाँव-गाँव से भारी संख्या में युवा-वृद्ध काले लोग ओबामा के समर्थन में बाहर निकले। इस चुनाव में हमने उन्हें सर्वत्र छाए हुए देखा। विश्वविद्यालयों के परिसरों में चुनाव की विशेष रौनक थी। बहुसंख्या में युवा मतदाताओं नें चुनावी प्रचार का गढ़ विश्वविद्यालयों को बनाया।

वर्त्तमान अमेरिका की गिरती-खस्ता आर्थिक हालत ओबामा की जीत का प्रमुख कारण बनी। पिछले आठ वर्षों से बुश के कार्यकाल में आर्थिक स्तिथि का जो पतन हुआ है उसने देश को १९२८ के ग्रेट डिप्रेशन के निकट लाकर खड़ा कर दिया है। चुनाव में ६९% लोगों ने अर्थिक स्थिति के कारण ओबामा को वोट दिया। १०% मतदातों के लिए इराक का युद्ध कारण बना एवं ९% लोग आतंकवाद से आतंकित थे। इस चुनाव से यह स्पष्ट हो गया है की युवा अमेरिकेन पीढ़ी के लिए आर्थिक स्थिति चर्च एवं धर्म की नीतियों से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
आरम्भ में ओबामा की पारिवारिक प्रष्ठभूमि पर बहुत चर्चा हुई। परन्तु ओबामा ने अपने भाषण में स्वयं को न श्वेत माना न अश्वेत माना परन्तु स्वयं को सार्वभौमिक कि श्रेणी में रखा है। युवा पीढ़ी को उनका यह कथन, ओबामा का व्यक्तित्व बहुत रास आया। रंग बदलता अमेरिका इस बात का प्रमाण है की अब अमेरिकेन मानसिकता का भी रंग बदल रहा है। अब श्वेत अमेरिका रंग बिरंगा हो रहा है। व्हाइट हाउस में काले राष्ट्रपति एवं उनका परिवार वास करेगा।

ओबामा का राष्ट्रपति बनना अमेरिका के काले समाज एवं विश्व भर के काले समाज के लिए विशेष अर्थ रखता है। ओबामा के जीतने के समाचार के साथ अमेरिका के प्रत्येक काले व्यक्ति की आँखों में ख़ुशी के आंसूं थे। ओबामा के राष्ट्रपति पद जीतने स्वीकृति भाषण में पूरा काला समुदाय भावुक होकर रोया था क्या बड़ा क्या छोटा? अनेक बुज़ुर्ग लोगों को यह स्वप्न सा लग रहा था की उनके जीवन काल में एक गुलाम का वंशज अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा। अफ़्रीकी देशों के लोग भी अपने में से एक को विश्व के सर्वशक्तिमान प्रजातंत्र के सर्वोच्च पद पर देखकर अति प्रसन्न हैं।

ओबामा की जीत की ख़ुशी में वाशिंगटन डी सी के अब्राहम लिंकन मेमोरीयल पर एक विशालकाय कार्ड पर अमेरिका वासियों ने बधाई सन्देश लिखे थे। इस अवसर को साक्षी बनाने के लिए तीन-तीन पीड़ी एक साथ मेमोरियल पर पहुची थी। पहले दिन ही ६० हज़ार हस्ताक्षर हो गए थे। २० जनवरी २००९ को राष्ट्रपति ओबामा शपथ ग्रहण करेंगे। इस समारोह में भाग लेने के लिए वाशिंगटन डी सी के पांच सौ मील की सीमा के सब होटल २४ घंटो के भीतर आरक्षित करा लिए गए।

अमेरिका के काले समुदाय को सदियों से दासता, गरीबी, पूर्वाग्रह, भेदभाव, कुंठा एवं अकेलापन झेला है। सैंकड़ो वर्ष की गुलामी, गृह युद्ध, दासता से मुक्ति के लिए संघर्ष, हैरियट जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को यातनाएं, भेदभाव के चरम सीमा जैसे अलग बाथरूम, अलग रेल में सीट, वोट ना देने का कानून, रोजा पार्क जैसी महिला की लड़ाई, मार्टिन लूथर किंग की असमय हत्या एवं अमेरिका के प्रमुख समाज द्वारा काले समाज को ना स्वीकारना ... इस समाज की त्रासदी की लम्बी सूची है। काले समुदाय में शिक्षा का अभाव रहा है, गरीबी अधिक रही है एवं अपराध भी इस समाज में अधिक होते हैं। निम्न मध्यम वर्ग का काला व्यक्ति नगर के उजड़े इलाके, गंदगी पूर्ण छोटे-छोटे घरों में रहता है। काले समाज में प्रभावकारी नेतृत्व का भी आभाव रहा है। काले समाज में जिन लोगों ने सफलता प्राप्त की है वह अधिकतर संगीत, नाच एवं खेल के शेत्र में रही थी। ये लोग स्वयं ही भ्रष्टाचार, दुराचार, व्यसन एवं अपराधिक वृतियों के शिकार रहे हैं। अतः मुहम्मद अली, माइकल जैक्सन, माइक तिएसुं एवं मगिक जोनसन जैसे लोग काले युवा समाज का रोल मॉडल नहीं बन सके। इन लोगों ने युवा मन को शिक्षा से दूर किया उन्हें फैशन, नाचना, खेल, शराब एवं दृग्स की ऑर आकृष्ट किया है। राजनीति में कुछ काले नेता उभरे हैं परन्तु वो आम काले समाज पर सकारात्मक प्रभाव नहीं दाल सके।

परन्तु बराक ओबामा की और यह समाज कुछ अधिक अपेक्षा से देख रहा है। ओबामा एक आम, औसत वर्तमान समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। काले समाज में अधिकांशतः परिवार में बच्चों का पालन-पोषण माँ करती है, पिता अनुपस्थित रहते हैं। बराक ओबामा के जीवन में पिता का अभाव रहा है, सौतेले पिता भी कम समय उनके जीवन में रहे हैं। उन्हें माँ और नाना-नानी ने पाला है। अभाव में रहकर ओबामा ने पढाई की एवं होवर्ड विश्विद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की है। होवर्ड विश्विद्यालय अमेरिका का सर्वश्रेष्ट्र विश्विद्यालय है। शिकागो में उनकी खासी वकालत जमी हुई है। इसके बाद राजनीति में प्रवेश प्रवेश किया, वर्षो सैन्टर रहे हैं। ओबामा अपनी सुयोग्य पत्नी एवं बेटियों के साथ ज़िम्मेदार एवं आदर्श जीवन बिता रहे हैं। उनमे कोई अवगुण एवं व्यसन भी नहीं है। किसी प्रकार का कोई अपवाद उनके साथ नहीं जुडा हुआ है। ओबामा सही मायने में काले युवा वर्ग के आदर्श बन सकते हैं।

काले समाज ने अपनी असफलता एवं पिछड़ेपन के लिए अन्य वर्ग को दोषी ठहराया है। पिछले दिनों एक युवक ने सही कहा था, "अब काले युवक-युवती के सामने ओबामा का आदर्श है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपनी मेहनत एवं योगता के बल पर राष्ट्रपति पद प्राप्त किया है। अब हमारे समक्ष सफल न होने के लिए कोई शमा नहीं है।"

- रेनू 'राजवंशी' गुप्ता

Monday, May 31, 2010

'सर्वोच न्यायलय का शर्मनाक कथन'

'सर्वोच न्यायलय का शर्मनाक कथन'

पिछले दिनों भारत के 'सर्वोच न्यायलय ने यह कानून पास किया कि विवाहेतर स्त्री-पुरुष के सेक्स संबंधो एवं उनके साथ साथ रहने को अपराध नहीं माना जायेगा, एवं इनके संबंधो से जन्मी संतान को अवैध नहीं माना जायेगा। मुझे इस कानून में कोई रूचि थी। यह तो व्यक्तिगत रूचि का विषय है कि भारतीय क्या स्वयं को विवाह कि परिधि से बाहर निकलकर उन्मुक्त जीवन जीने के परिणाम भोगने के लिए तैयार है...या नहीं ??
अच्छा हो भारतीय अमेरिका या यूरोपियन समाज के ध्वस्त होते पारिवारिक ढांचे को देख ले।

परन्तु सर्वोच न्यायलय ने अपने निर्णय मे एक ऐसा वक्तव्य दिया जिसे पढ़कर मैं क्रोध एवं अपमान से तिलमिला उठी. रिपोर्ट में कथन था "शास्त्रों -पुराणों के अनुसार भगवान् श्री कृष्ण एवं श्री राधा भी साथ साथ रहते थे" यानि सुप्रीम कोर्ट अपने निर्णय को न्याय संगत बनाने के लिए हिंदी धर्म-शास्त्रों को पतित कर रहे हैं. जनता के सामने झूठे लज्जापूर्ण वक्तव्य दे रहा है। इस निर्णय को घोषित करने वालों मे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश श्री के.जी बालकृष्नन के साथ न्यायधीश श्री दीपक वर्मा एवं श्री बी.एस चौहान सम्मलित थे. सुप्रीम कोर्ट भारतीय कानून व्यवस्था की सर्वोच शाखा है एवं उसके न्यायधीश सबसे अधिक योग्य,शिक्षित एवं योग्य माने जाते है। इनके कथन एवं निर्णय लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं इनके द्वारा लिखा गया ऐसा घ्रणित एवं गैरजिम्मेदाराना एवं घ्रणित कथन है.

श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी की भारत ही नहीं पूरे विश्व में पूजा की जाती है। प्रत्येक देश में श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी के भक्त मिल जायेंगे,इनके मंदिर मिल जाएँगे। जो भी व्यक्ति हिन्दू धर्म को जानना चाहता है वह श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी का जीवन चरित अवश्य पढता है एवं इनके दिव्य-अलौकिक प्रेम एवं भक्ति को अवश्य अंगीकार करना चाहता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार गोपी-भाव की भक्ति सर्वोच्च कोटि की शुद्ध भक्ति मानी जाती है बृज की गोपियाँ साधारण ग्रामीण महिलाएं नहीं है ये ऋषि मुनि एवं साधक हैं। श्री राधा रानी जी श्री कृष्ण की अहलादिनी शक्ति है इनके सम्बन्ध नित्य, सनातन एवं शाश्वत है, इनका प्रेम दिव्य एवं पारलौकिक है, इनके सम्बन्ध को मानवीय संबंधो की सीमाओं मे नहीं बांधा जा सकता हैi श्री कृष्ण स्वयं परमानन्द है, योग योगेश्वर है एवं सचिदानंद है एवं श्री राधा रानी इनकी शक्ति है। वास्तव मे दोनों एक ही है इसलिए इनकी युगल छवि भक्तो के ह्रदय मे रहती है। ऐसे संबंधो को मानवीय कहना ही पाप है, मैं भारत के इन न्यायधीशो से पूछना चाहती हूँ कि उन्होंने श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी के दिव्य संबंधो के स्वरुप को पहचाना है, क्या उन्होंने श्रीमद भगवत गीता एवं श्रीमद भागवद महापुराण का अध्यन किया है? तो किस आधार पर उनकी कलम सर्वोच न्यायलय कि पीठ पर बैठकर ऐसे शर्मनाक व्यक्तव्य लिख सकती है।
हमारे न्यायधीश यदि अज्ञान या मोह वश इन्हें सामान्य स्त्री पुरुष भी मानें तो भी कोई शास्त्र या प्रमाणिक ग्रन्थ इस तथ्य कि पुष्टि नहीं करता है कि श्री कृष्ण एबं श्री राधा रानी एक घर मे साथ साथ रहते थे। सबसे प्रमुख तथ्य यह है कि श्री कृष्ण ने चौदह वर्ष की आयु में बृज छोड़ दिया एवं कभी वापस लौटकर नहीं आये।
यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि इस धरा की संतानों को अपने देश के इतिहास ,धर्म एवं संस्कृति का ज्ञान नहीं है। भारतीय उच्च शिक्षा प्राप्त करते है,बड़ी बड़ी डिग्री प्राप्त करते है अन्य देशों का इतिहास, राजनीति,धर्म एवं संस्कृति जानने की इच्छा रखते है। परन्तु अपने बारे मे जानने की जिज्ञासा नहीं है। अपने देश के इतिहास ,धर्म एवं संस्कृति के प्रति ये इतने संवेदनहीन हो जाते है कि उसका अपमान करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते है।
व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति कि सोच कुछ भी हो सकती है.... परन्तु शासन या न्यायल्य कि पीठ पर आसीन होकर एसे कथन लिखना या घोषित करना स्वयं मे एक अपराध है।

सर्वोच न्यायलय के न्यायधीश श्री बालकृष्नन को, श्री दीपक वर्मा एवं श्री चौहान को हिन्दू समाज से क्षमा याचना करनी चाहिए एवं इस तथ्य को तुरंत सर्वोच न्यायलय कि रिपोर्ट में से निकल देना चहिये।
अंत में सर्वोच न्यायलय के न्यायधीश श्री बालकृष्नन का नाम उनके माता पिता ने श्री भगवान कृष्ण के नाम पैर ही रखा होगा।

रेनू 'राजवंशी' गुप्ता
सिनसिनाटी, ओहायो, अमेरिका

Sunday, April 25, 2010

आयु

समय की कोई आयु नहीं
जीवन की कोई आयु नहीं
प्यार की कोई आयु नहीं
आयु की कोई आयु नहीं

तन की आयु तो है
परन्तु मन की कोई आयु नहीं।
समय की कोई आयु नहीं।

आयु है घर की
है आयु घर के सामान की ।
आयु है नौकरी की
तो आयु है व्यवसाय की
परन्तु कामनाओ की कोई आयु नहीं ।
समय की कोई आयु नहीं ।

आयु है फ्रेम में सजे चित्र की
है आयु रंग की तुलिका की ।
आयु है कलाकार की
परन्तु कला की कोई आयु नहीं ।
समय की कोई आयु नहीं ।

आयु है कविता की
है आयु कविता की किताब की ।
आयु है कथा कथाकार की
परन्तु भावों की कोई आयु नहीं ।
समय की कोई आयु नहीं ।

आयु है तुम्हारे हमारे साथ की
है आयु बच्चों के माता पिता के साथ की।
आयु है दोस्तों के साथ की
परन्तु दोस्ती की कोई आयु नहीं ॥

रेनू 'राजवंशी' गुप्ता

अभिनन्दन एवं काव्य गोष्ठी


अभिनन्दन एवं काव्य गोष्ठी



Saturday, April 3, 2010

Supreme Court’s Shameful Statement

Recently Supreme Court of Bharat has passed the law that live-in relationships between man and woman , sex relations between them are not an offence, the children born out of the wedlock will not be considered as illegitimate children. It is a legal. Interpretation of the law and I have personally no problem with it. However, such a behavior is going to break the basic fabric of an Indian society.

In the same supreme courts judgment one of the statement was made that “Even Lord Krishna and Radha lived together according to mythology”. It is extremely shameful, hurting, humiliating and insulting statement coming from one of the highest institution of the country. This statement was delivered by the chief justice of Supreme Court K. G. balkrishnana, Justice Deepak Verma and Justice B. S, Chouhan. These judges have earned one of the highest degrees in education possible; they are considered highly capable, educated and scholarly people. This statement was given without the knowledge and understanding of the scriptures and misleading to people of India and rest of the world...

Bhagwan Shri Krishna and his ever bliss power Shri Radha Rani are worshipped in the whole world. You can find their devotees in each corner of the universe. Any seeker who wants to know about Hindu Dharma will definitely study the life of Shri Krishna and shri Radha Rani, would like to understand the true nature of their divine relationships. According to our scriptures and the devotion of Rdha and gopies is the highest kind of devotion. The gopies of brij are not village women, they are Rishis, Saints and seekers in their previous lives and came to this world again to be with Shri Krishna and Shri Radha. The same way Shri Radha Rani is eternal blessing power of Shri Krishna , their relations are eternal, true, divine and can not be define in human limitations. Shri Krshna himself source of all the creation, Yogi-Yogeshwar and Sat Chit Anand. It is sin to call them just humans. I want to ask these judges, have they ever studied Shrimad Bhgawat Geeta or Shrimad Bhaagwat Mahapuran ? Then on what ground their pen residing over the chair of Supreme Court can write such low statement.

Even for any reason our respected Judges don’t consider Shri Krishna and Shri Radha Rani as divine figures still, no scripture or any authentic book says that Shri Krishna and Radha Rani lived together. For their information Shri Kishna left Gokul at the age 14 and never came back so the question of their living together never arose.

As a Hindu I am extremely hurt and disappointed with this statement . It is the misfortune of India that sons and daughters of this nation who acquire highest degrees, want to know the history, politics and what not of others countries, but fail get true knowledge their own history. As a result are giving false statement and misleading people.

Individually any one can have their own opinion about anything. But sitting on the highest chair of judiciary system and giving such false , insensitive and insulting statements about the Dharma or culture is a crime. Chief justice Shri K. G. Balkrishnan along with other judges needs to remove that statement from the report and sincerely apologize to all Krishna and radha devotes of this world. Ironically Balkrishnan is also name of Shri Krishna, I hope he understands the real meaning of his name.

Renu Rajvanshi Gupta
US
nishved@yahoo.com

Friday, April 2, 2010

स्वागत उदघोष

अपने ब्लॉग (आयाम) में मैं, रेनू "राजवंशी" गुप्ता अपने मित्रों, बंधू-बांधवों, पाठकों एवं सुधि साहित्य प्रेमियों का स्वागत करती हूँ। इन्टरनेट (अंतरजाल) एवं कंप्यूटर के युग में अपना एक ब्लॉग होना चाहिए यह जोर मुझ पर मेरा मन भी दे रहा था और आत्मार्यजन भी दे रहे थे। सबसे प्रबल आग्रही था मेरा पुत्रवत छोटा भाई अभिषेक गुप्ता, जो कि स्वयं कंप्यूटर साइंस का विशेषज्ञ है। यह ब्लॉग भी उसी ने बनाया है... जिसे मैं साधुवाद देती हूँ।
तो लीजिये ब्लॉग प्रस्तुत है... इसमें आपके मार्गदर्शन की अपेक्षा रहेगी एवं आपके सुझावों का स्वागत होगा। लेखन व्यक्ति का शौक भी हो सकता है, आवश्यकता भी हो सकती है, विवशता भी हो सकती है, साधना भी हो सकती है एवं समस्यओं से लड़ने का विकल्प भी हो सकता है। लेखन मेरे लिए क्या है...? यह मैं खोज रही हूँ। लेखन ने मेरे जीवन में अनायास ही प्रवेश किया। वर्ष १९७६ का अप्रैल माह था, मैं परीक्षा की तयारी कर रही थी, विषय अंग्रेजी था, अचानक मेरी कलम हिंदी में चलने लगी और किशोरभावों को व्यक्त करती एक कविता "कैसे हैं वो" लिखी गयी। आज चौंतीस वर्ष हो गए हैं... यह लेखनी निरंतर चल रही है... कविता, संस्मरण, कहानी, लेख, एवं उपन्यास के सोपानों को पार कर लम्बी यात्रा तय की है। अनेक पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों ने मेरी अनेक रचनओं को स्थान दिया है।
मेरे लेखन का जन्म भारत में हुआ था, परन्तु उसका पालन-पोषण एवं सर्वद्धन अमेरिका में हुआ है। विवाह पश्चात पति अरुण के साथ अमेरिका पहुच गयी। पिछले तीस वर्षों से अपने दोनों बेटे निष्काम एवं वेदान्त के साथ हमारा अमेरिका ही निवास है। यह कहूं की भारत मेरी पुण्य भूमि है और अमेरिका मेरी कर्म-भूमि है, तो अन्यथा नहीं होगा।
अमेरिका में बसे भारतियों का जीवन निकट से देखा है, उसे जिया है। साथ ही भारत में अपने आत्मीयजनों का जीवन भी देखती रही हूँ। मेरा लेखन दोनों देशों भारत एवं अमेरिका के बीच झूलता रहा है। तीन वर्ष पूर्व जागरण समाचार पत्र में कॉलम लिखने का अवसर मिला तो दैवी कृपा से लेखनी के अनेकों संस्मरणात्मक लेख निकले और मुझे अपने विचारों को पाठकों के सामने रखने का धरातल मिला। आरम्भ में मेरी लेखनी मूलतः कवितांश ही रही परन्तु कालांतर में वह गद्य लेखन की ओर मुड गयी! दो कविता संग्रह प्रवासी-स्वर एवं प्रवासी-मन एवं दो कहानी संग्रह "कौन कितना निकट" एवं "जीवन लीला" प्रकाशित हुए हैं। उपन्यास "असतो मा सद गमय" एवं "तमसो मा ज्योतिर्गमय" प्रकाशित पुस्तके हैं। इसी कड़ी में "मृत्योर्मा अम्रतम गमय" शीर्षक से कैंसर विषय पर उपन्यास का कार्य चल रहा है। जागरण में प्रकाशित आलेखों का संग्रह प्रकाशाधीन है।
मेरा प्रयास यही रहता है की मैं "स्वान्तः सुखाय" ही लिखूं एवं अपनी लेखनी को ईश्वर का प्रसाद मान कर ग्रहण करूं। जो भी लिखूं, मन से लिखूं एवं वह सीधे पाठकों के मन तक पहुंचे। तो प्रस्तुत है ब्लॉग के महासागर में बूँद समान मेरा एक छोटा सा ब्लॉग (आयाम)

मैं खुश हूँ एक बूँद बनकर ........

बूँद में क्षमता है , सागर का निर्माण करे।

बूँद-बूँद से ही तो सागर बनते हैं,

सृष्टि के निर्माण की सहभागी,

मैं खुश हूँ एक बूँद बनकर॥



रेनू "राजवंशी" गुप्ता
nishved@yahoo.com
renurajvanshigupta@gmail.com